धर्म शब्द संकृत भाषा से आया है जो हिंदू से उत्पन हुवा है धर्म शब्द का अर्थ होता है, मानव समाज को चलाने के लिए जो नियम कानून की विधियां ऋषी मुनियों ने बनाया है उसी नियम से समाज चले और वह विधियां पुराणों में लिखित है इसी नियम विधि को धर्म कहा गया है
धर्म क्या है गीता के अनुशार

जो विधियां मानव समाज को चलाने के लिए बनाए गए जो शास्त्रों पुराणों में लिखित है उसी विधि नियम को धर्म बोला गया है नीचे
शास्त्रों पुराणों में बताए गए नियम से चलने को ही भागवत गीता में धर्म कहा है ।।
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उदाहरण।
महाभारत क्यो हुवा आपसे पूछते है तो सुनिए महाभारत होने का कारण था छल कपट, जुआ, बड़ो का आदर न करना, लालच, द्वेष, और स्त्री का भरे समाज में नंगा करना, यह सब करना पुराणों में शास्त्रों में मना किया गया है लेकिन किसीने भी उन नियमों का पालन नहीं किया है
जिसके कारण यह भीषण युद्ध हुवा, भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण यही कहते है बार बार जो धर्म के बताए गए मार्ग पर नही चलेगा मैं उसका अंत कर दूंगा और जो धर्म के मार्ग में चलेगा मैं उसका साथ दूंगा। वही पृथ्वी पर जीने का अधिकारी है। अधर्मी नही ।।
अब मेरी बात को ध्यान से समझिए। पुराणों में मनुष्य को कैसे जीवन जीना है सभी विधियां नियम कानून लिखे गए है जैसे बड़ो का आदर करना, सच बोलना, चोरी नही करना, किसी के बारे में मन विचार से भी बुरा नही सोचना, सुबह रोज स्नान करना, सबसे प्रेम करना, यही नियम धर्म कहलाता है इसी नियम पर चलने को भगवान श्री कृष्ण कहते है सही मनुष्य का असली धर्म है सच्चा धर्म है
निष्कर्ष –
धर्म क्या है गीता के अनुशार – मनुष्य जीवन 4 लक्ष्य होता है, अर्थ, काम, धर्म, मोक्ष, अर्थ का मतलब, होता है, जीवन यापन, के लिए कर्म करना, पैसे कमाना,। ( काम )अर्थार्थ, बच्चे पैदा करना संभोग, करना , (धर्म), अर्थ, और काम को एक विशेज नियम, से करना पैसे भी कमाओ नियम , संभोग करो तो नियम से , मतलब प्रत्येक कर्म, एक नियम से करना धर्म कहलाता है
जो इस नियम से नही चलेगा वह अधर्म हो जायेगा इसी को भागवत गीता में बोला गया है, की प्रत्येक व्यक्ति अपना जीवन शास्त्रों में बताए गए नियम विधि से जीना चाहिए, यही धर्म है। शास्त्रों पुराणों में बताए गए नियम से चलने को ही धर्म भागवत गीता में कहा है ।।।
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